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सिजोफ्रेनिया के रोगियों में रहती भ्रम जैसी स्थिति, दवा के साथ भावनात्मक सपोर्ट जरूरी

सिजोफ्रेनिया मानसिक बीमारी है। इससे पीडि़त व्यक्ति कल्पना और वास्तविकता में अंतर नहीं कर पाता है। भ्रम में रहता है। खुद को बीमार भी नहीं मानता है। इसमें व्यक्ति अपने परिजनों पर ही शक करने लगता है। पुरुषों में इसके अधिक मामले 20 वर्ष और महिलाओं के 30 वर्ष के आसपास देखने को मिलते हैं। 24 मई को सिजोफ्रेनिया दिवस मनाते हैं।
सोचने और बोलने में अंतर होना, व्यवहार में बदलाव जैसे क्रोध करना, अलग-अलग तरह की प्रतिक्रिया देना, उत्साह में कमी, दिनचर्या में बदलाव, अकेले रहना, किसी को खुश देखने से परेशानी, अपनी दिनचर्या को सही तरह से प्लान न कर पाना आदि।
इसके स्पष्ट कारणों का पता नहीं है। लेकिन आनुवांशिक, मस्तिष्क के हार्मोन में असंतुलन और पर्यावरणीय कारण भी हो सकते हैं। नशे से इसकी दिक्कत बढ़ती है
इलाज और बचाव
इसमें दवाइयों के साथ विहैबियरल थैरेपी देते हैं। गंभीर मरीजों को भर्ती करने की भी जरूरत पड़ती है। मरीज को तनाव और नशे से दूर रखें। मरीज की भावनात्मक जरूरतों को समझें। दवाइयां नियमित देते रहें। बीच-बीच में काउंसलिंग भी करवाते रहें।



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