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Health News: ब्‍लैक और व्‍हाइट फंगस से बचने के लिए मास्क पहनना बेहद जरुरी, इन लक्षणों से करें पहचान

Health News: कोरोना संक्रमण के मामलों में वृद्धि के साथ ही अब नई बिमारी ने भी अपना असर दिखाना शुरू कर दिया है। कोरोना से रिकवरी के बाद ब्‍लैक और व्‍हाइट फंगस का खतरा बेहद बढ़ गया है। कई राज्यों में ब्‍लैक और व्‍हाइट फंगस को महामारी घोषित कर दिया है। ब्‍लैक और व्‍हाइट के बाद उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में येलो फंगस का मामला भी मामला सामने आया है। विशेषज्ञों की मानें तो फंगस का खतरा सबसे ज्यादा कोरोना संक्रमितों को है। खासकर डाइबिटीज के मरीजों को ब्लैक फंगस का खतरा है। यह बीमारी डाइबिटीज के चलते कमजोर हुए इम्यून सिस्टम, लंबे समय तक वेंटिलेटर पर रहने और वोरिकोनाजोल थेरेपी देने से पैदा होती है। कोरोना से रिकवर हुए मरीज बड़ी संख्या में इसका शिकार हो रहे हैं।

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इसके लिए सरकार ने एडवायजरी कर लोगों को प्राथमिक लक्षण में ही डॉक्टर्स से संपर्क करने की सलाह दी है। कोताही बरतने पर यह बीमारी खतरनाक साबित हो सकती है। कई मामलों में व्यक्ति का जबड़ा या आंखों की सर्जरी तक करनी पड़ जाती है। तेलंगाना के चिकित्सा शिक्षा महानिदेशक ने मधुमेह के मरीजों को इसके लिए आगाह किया है जो कोरोना से रिकवरी हुए हैं। इन मरीजों को रिकवर होने के बाद भी दो महीने तक लगातार घर में मास्क पहनकर रहना चाहिए।

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ब्लैक फंगस का खतरा
मधुमेह के मरीजों में ब्लैक और व्‍हाइट फंगस का खतरा अधिक है। ब्लैक फंगस कोई संक्रामक रोग नहीं है। लेकिन व्‍हाइट फंगस की तुलना में बेहद खतरनाक भी है। जिन व्यक्तियों की इम्युनिटी कमजोर होती है, उन्हें इस बिमारी का ज्यादा खतरा है। मस्तिष्क और फेफड़ों में संक्रमण होने पर मरीज की मौत भी हो सकती है।

ब्लैक फंगस के लक्षण
प्राथमिक लक्षण के तौर पर इसकी पहचान की जा सकती है। जिसमें चेहरे में दर्द, आंख की पलक में सूजन और कम दिखने पर तत्काल डॉक्टर से परामर्श लेवें। स्वास्थ्य मंत्रालय ने ब्लैक फंगस के मरीजों को इलाज के लिए दवाइयां और दो सुई लगाने की सलाह दी है। वहीं, ICMR ने मधुमेह से पीड़ित कोरोना मरीजों को स्टेरॉयड नहीं लेने की सलाह दी है।

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व्हाइट फंगस के लक्षण और उपचार
व्हाइट फंगस (कैंडिडिऑसिस) एक प्रकार का सामान्य संक्रमण है। यह भी फंगस से होता है। जिसे कैंडिडा कहते हैं। यह संक्रमण इम्युनिटी कमजोर होने पर हो जाता है लेकिन इससे गंभीर नुकसान नहीं होता है। इसका संक्रमण कई बार कुछ दिनों में खुद से भी ठीक हो जाता है। इसलिए परेशान होने की जरूरत नहीं है। सीनियर फिजिशियन डॉ. आरएस खेदड़ का कहना है कि इसको ब्लैक फंगस की तरह देखना ठीक नहीं है। ब्लैक फंगस (म्यूकरमाइकोसिस) अधिक आक्रामक होता है। इससे साइनस, आंखों, मस्तिष्क को बहुत नुकसान हो सकता है। इससे बचाव के लिए बड़े स्तर पर सर्जरी की जरूरत होती है। कई बार यह जानलेवा भी हो जाता है जबकि व्हाइट फंगस का इलाज आसानी से होता है। इससे जीवन का खतरा नहीं है। कमजोर इम्युनिटी वाले, डायबिटीज से पीडि़त और कोरोना रिकवरी के बाद लंबे समय तक स्टेरॉइड लेने वाले मरीजों में व्हाइट फंगस की आशंका रहती है। लेकिन चिंता की बात नहीं है।

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